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Chachi ki Chudaai ki Kahani Chachi Ki Chut Akhir Mil Hi Gayi —  


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Ad details: Chachi ki Chudaai ki Kahani Chachi Ki Chut Akhir Mil Hi Gayi,

सीधी बात नो बकवास..
मौका मिलते ही चंदर छत पर चढ़ गया… अंधेरा काफी था, नीचे शादी में मौजूद लोगों का शोर तो ऊपर तक आ रहा था, पर लाइट नहीं पहुँच रही थी।

उसने जल्दी से पजामे का नाड़ा खोला और कब से फूल रहे लौड़े को बाहर निकाला..
‘आह..’ जान में जान आई।

सेक्सी चाची का सेक्सी बदन
वह छत की रेलिंग पर आगे झुका तो रानी चाची और दूसरी औरतों पर नजर पड़ी। या नहीं.. नजर तो रानी चाची पर ही पड़ी.. बाकी तो जैसे होकर भी नहीं थी।

रानी चाची ने लहंगा-चोली पहनी थी जिसमें से उनका गोरा पेट झांक रहा था। चोली का गला इतना नीचा था कि कसे हुए उभार झांक रहे थे।
चंदर गर्म और ऐंठकर जामुनी हो आए सुपाड़े को हल्के-हल्के सहलाने लगा। लौड़ा इतना सख्त हो गया था कि चाहे कोई पकड़ कर लटक भी जाए, झुकने वाला नहीं था, हाथ लगाने से करंट सा दौड़ रहा था।

उसकी आंखों में रानी चाची का गोरा, भरा हुआ बदन घूम रहा था कि जैसे उसने रानी को कसकर जकड़ रखा है और उसका सख्त लंड चाची के लहंगे के ऊपर से ही उनकी मुलायम जांघों में घुसा जा रहा है। रानी की सांसें तेज चल रही हैं और उनके सख्त हो आए निप्पल चंदर की छाती में गड़ रहे हैं।

चंदर ने उनका लहंगा ऊपर किया। रानी ने नीचे कुछ नहीं पहना था और वह इतनी गीली हो गई थीं कि उनकी चूत का रस नंगी टांगों पर बह रहा था.. चंदर ने लौड़ा टांगों में कसकर दबाया.. रानी ने खुद को उसके हिसाब से ऊंचा किया कि लंड गप से चूत के अन्दर घुस गया। गर्म.. मुलायम चूत ने सख्त लंड को जोर से कस लिया।

इस कल्पना से चंदर की कनपटियों में हथौड़े से बजने लगे। उसका हाथ लंड पर तेजी से चलने लगा और जोर से उसका लावा फूट पड़ा। उसकी आंखें बंद हो गईं.. मुँह खुल गया। सांस रुक गई और आनन्द का उबाल चरम पर पहुँच गया.. और तभी जोर से पिचकारी छूटी, जो रेलिंग की जाली से नीचे बरस गई।

चंदर ने लंड को मुट्ठी में और जोर से जकड़ लिया कि जैसे उसका दम ही घोंट देगा। चंदर को आनन्द में स्वर्ग नजर आने ही लगा था कि पीछे से आवाज आई ‘अरे चंदर.. यहाँ क्या कर रहा है अकेला..!’

चंदर का मुँह ‘भक्क..’ से खुल गया। हाथ हिलाने का भी वक्त नहीं मिला। उसने बस हाथ से लौड़े को ढक लिया।
रानी चाची पास आ रही थीं, उनके हाथ में कुछ था- मैं नीचे ढूंढती रही.. तू दिखाई नहीं दिया। ले मिठाई लाई हूँ और तू कर क्या रहा है?
‘क..क..कुछ नहीं.. चाची.. बस बैठा था।’

‘अरे मिठाई ले ना.. हाथ क्यों छिपा रखा है?’ चाची ने उसका हाथ मिठाई देने के लिए पकड़कर खींच लिया।
‘अरे यह गीला.. उसने अपना हाथ सूंघ कर देखा और सकपका गईं। अंधेरे में साफ नहीं था कि चंदर के नंगे लंड पर उसकी नजर पड़ गई।

चंदर को काटो तो खून नहीं।
चाची ने खुद पर काबू किया और थूक गटकते हुए बोलीं- तू मिठाई खा ले.. और अकेला मत बैठ.. नीचे आ जा।
वह मुड़कर नीचे चली गईं।

चंदर की जान में जान आई, झट से नाड़ा बांधने लगा, शायद चाची ने न देखा हो पर वह सूंघ कर देख रही थीं।
उसे इतनी झेंप हो रही थी कि वहीं खाट पर बैठ गया।
इसके बाद तो चाची से नजरें चुराता रहा। यह बात अलग है कि उसी का ध्यान कर दिन में तीन-चार बार मुट्ठ मारता।
चाची ने भी उस पर ध्यान नहीं दिया, कुछ चुप सी हो गईं।

चाची की लड़की मुनिया अब भी दौड़-दौड़ कर उसके पास आती, पर वह खुद बिदक जाता। मुनिया अभी कमसिन है, शरीर उभर रहा है। एकदम पतली और फुर्तीली। चंदर का ध्यान दो-एक बार उस पर भी गया.. पर एक तो चाची का गुदगुदा पतला बदन, दूसरे कुछ गड़बड़ होने का चांस था।

उसने मन पर काबू रखा.. पर इसका क्या करें कि हर वक्त ध्यान चाची पर ही लगा रहता। चाची सुबह पांच बजे उठकर डंगरों (पशु) का सानी-पानी करतीं।
यह वक्त चंदर का भी पसंदीदा था.. क्यों इस वक्त अक्सर वह ब्लाउज-पेटीकोट में ही रहती थीं.. और शायद नीचे कोई कपड़ा नहीं पहना होता।

चंदर पड़ोसी था और उसका मकान चाची के मकान के साथ ही लगता था। वह जानबूझकर छत पर सोता.. ताकि सुबह चाची के गुदगुदे बदन के स्वाद ले सके।

दोपहर को सारा काम निबटाकर चाची घास लेने चली जातीं, लेकिन अक्सर मुनिया और चाचा साथ होते।

पर उस दोपहर हल्की बारिश थी। शायद चाची ने मुनिया को इसलिए साथ नहीं लिया.. चाचा भी हाट गए थे, चंदर चुपचाप चाची के पीछे हो लिया।

कुछ देर गांव के इक्का-दुक्का लोग दिखते रहे.. फिर सुनसान हो गया। खेत कुछ दूर थे। चाची तेज कदम चलाते हुए पहुँची। चंदर ने कुछ दूरी रखी, ताकि वो दिखाई ना दे।

एक-दो बूंदें अब भी पड़ रही थीं। चाची ने इधर-उधर देखा और झट से साड़ी खोलकर पल्ली के नीचे रख दी। पेटीकोट को घुटनों तक ऊपर कर एक पेट पर एक तरफ खोंसा और खड़ी-खड़ी ही दराती से ज्वार काटने लगीं।

चंदर पीछे के खेत में ही चार फुटी ज्वार में छिपा खड़ा था। उसे चाची का पेटीकोट उनके चूतड़ों की दरार में घुसा दिख रहा था। जरा सा गीला होने से वह चिपक गया था। हल्के रंग का पतला सा पेटीकोट.. मोटे चूतड़.. ऊपर से बारिश हो रही थी।

चंदर को चाची के चूतड़ों के कटाव साफ दिखने लगे। चाची जरा-जरा सी देर में सीधे खड़े होकर देख लेती कि आस-पास कोई है तो नहीं.. और फिर काम में लग जातीं। उनके पतले बदन का भारी पिछवाड़ा.. गोरी रोमरहित पिंडलियां, चंदर का गला खुश्क कर रही थीं। रगड़ने से उसके लंड में दर्द होने लगा था।

आखिर उससे रहा नहीं गया। वह पीछे से बाहर निकल आया और चाची के पास आकर कांपती आवाज में बोला- मैं मदद करूँ चाची?

चाची सकपका कर एकदम खड़ी होकर मुड़ गईं ‘तू कब आया..?’
उन्होंने पेटीकोट नीचे करते हुए पल्ली के नीचे से साड़ी निकाली.. जल्दी से चारों तरफ नजर डाली.. कुछ निश्चिंत सी हुईं और चंदर की तरफ देखा।

उनकी आंखों ने कोने से चंदर का उभार देख लिया.. जो पजामे को तंबू बना रहा था। हालांकि उन्होंने सीधे नहीं देखा.. पर चंदर को लगा कि चाची की नजर खड़े लंड पड़ गई है।

चाची एक क्षण खड़ी रहीं.. फिर साड़ी को वहीं पल्ली के नीचे रखते हुए बोलीं- बारिश में गीली हो जाएगी.. ठीक है तू ज्वार लगाता जा.. मैं काट रही हूँ.. और हाँ.. आस-पास नजर रखना.. कोई हो तो बता देना।
वह फिर ज्वार काटने को झुक गईं।

चंदर ने थूक गटका.. चाची की गांड की गोलाई इतने पास थी कि वो छू भी सकता था। उसी तरफ नजरें गड़ाए.. वह दिखावे के लिए ज्वार के एक-दो पौधे उठाने लगा। उसने अपने टाइट लंड को हाथ से कसकर दबाया कि अचानक चाची ने पीछे देखा.. और सकपका गईं।
चाची हकलाकर बोलीं- ध्यान कहाँ है चंदर.. जल्दी कर!
वह फिर झुक गईं।

अब चंदर का अपने पर कंट्रोल नहीं रहा। चाची के पीछे आकर उसके हाथ से दराती लेने को हाथ बढ़ाया और थूक गटकते हुए बोला- ला चाची मैं काट दूँ.. तू..तू.. बैठ जा थोड़ी देर!

इसके साथ ही उसका लंड चाची के चूतड़ पर जरा सा लगा। आहहहह..!
वह गनगना गया..

चाची धीरे से बोलीं- जो बोला है, वो कर.. देर हो रही है।
चंदर नहीं माना।
वो लंड जरा सा और भिड़ाते हुए और झुका और दराती पकड़ी.. फिर धाड़-धाड़ बजते दिल से चाची की गांड पकड़कर लंड को दरार में कसकर गाड़ दिया।

चाची ने घबराकर उठना चाहा, पर गिर जातीं.. सो उन्होंने दोनों हाथ धरती पर टिकाए ही थे कि तब तक चंदर जोर-जोर से पागलों की तरह घस्से लगाने लगा।
घुटने मोड़ कर.. पैर जरा से खोले हुए वह राक्षस की तरह रगड़ के साथ धक्के लगा रहा था कि पल भर में उसे तारे दिखने लगे और इतनी जोर से झड़ा.. लहू से माथे की नसें फटने को हो आईं।
वो लंड को कसकर चेपकर खड़ा रहा।

कुछ देर झटके लगते रहे.. चाची ने उसे धक्का देकर अलग किया.. तब उसे होश आया।

चाची का मुँह लाल हो गया था.. वह उसे घूर रही थीं, पर उसके मुँह से आवाज नहीं निकल रही थी।

चंदर ने कुछ कहना चाहा कि चाची बोलीं- तू घर चल आज.. तेरी माँ तेरी खबर लेगी।
वह घिघियाया- चाची.. नहीं चाची.. म..मैं..
चाची ने घुड़का- चुपचाप बैठ अब..

वह पालतू कुत्ते की तरह मेढ़ पर बैठ गया। चाची एक क्षण खड़ी रहीं.. फिर उसी तरह घास काटने लगीं।
बारिश और तेज हो गई।

कुछ देर तो चंदर शर्म के मारे नजर नहीं उठा सका.. पर चाची के उठे हुए चूतड़ फिर सामने थे। उसने चोर नजरों से देखा.. उसका जवान लंड फिर झटके मारने लगा।

चाची के उठते ही नजर नीची कर ली।
चाची ने उसे देखा.. फिर कुछ दया सी करती हुई बोलीं- अच्छा.. अच्छा.. अब कुछ नहीं कहूँगी.. पर ऐसा गंदा काम तूने किया कैसे..? चल खड़ा हो अब!

वह पास को आईं और उसे कंधे से पकड़ कर खड़ा किया। वह चाची से लिपट कर सुबकने लगा.. वह पीठ पर हाथ फेरने लगीं कि लंड फिर उसकी जांघों में चुभने लगा।

उसने चाची को और कस लिया। चंदर की आंखें बंद थीं.. सांसें तेज.. बस वह हिलते हुए डर रहा था। इधर उसका लंड था कि पजामे और पेटीकोट के पतले से कपड़े में से चूत की गर्माई महसूस कर और फूल गया था।

उसने और कसकर दबाया तो चाची ने छुड़ाने की कोशिश करते हुए कांपती आवाज में कहा- छोड़ अब.. फिर वही.. देख अब भी तेरी माँ से बोल सकती हूँ।
‘चाची..’ उसने उसी तरह जकड़े-जकड़े कहा- तू कितनी अच्छी है।
वह हँसीं- हाँ.. हाँ.. ठीक है.. अब छोड़।
‘नहीं पहले बोल कि माँ से नहीं कहेगी।’
‘अच्छा ठीक है.. नहीं कहूँगी.. अब छोड़।’

चंदर ने हल्का सा ढीला किया.. पर छोड़ा नहीं.. चिरौरी की आवाज में बोला- चाची.. एक बार।
उसने गनगना कर फिर से लंड को दबाया ‘एक बार.. वो करने दे..’ उसने हिम्मत कर बोला।

चाची ने गुस्से में थप्पड़ मारा।

चंदर अब पूरा गर्म हो चुका था। बिना कुछ सोचे वह पीछे हटा और झट पजामा नीचे कर दिया।
उसका बारिश में धुलता तना हुआ लंड चाची के मुँह की तरफ देखकर फुंफकार रहा था। नई उम्र की मुलायम झांटों के बीच उसका जामुनी रंग बड़ा प्यारा लग रहा था।
चंदर ने कस कर दबाते हुए कहा- अब रहा नहीं जाता चाची.. बस एक बार करने दे।
चाची ने झिड़का- पागल है.. मैं तेरी चाची हूँ।
वह मुड़कर घास उठाने लगीं।

चाची की चूत में लंड
चंदर आगे बढ़ा और तेजी से चाची का पेटीकोट उठाकर कमर पर कर दिया। इससे पहले कि चाची उठ पातीं.. उसने गांड में सुपाड़ा कसकर चाप दिया। चाची एक हाथ आगे टिकाए दूसरे हाथ पीछे कर उसकी टांग पर थप्पड़ बरसाने लगीं।

पर बारिश से कहो या सुपाड़े की चिकनाई से.. चंदर को रास्ता मिल ही गया। इस घस्से में लंड फिसलकर गर्म मुलायम गुफा में सरका तो उसका रोम-रोम जन्नत में डूब गया।
उसके लंड का एक-एक जर्रा.. उस गर्म और कसी हुई चूत को महसूस कर रहा था।

वह अब घस्से नहीं लगा रहा था, पर लंड को इतनी जोर से भिड़ा रहा था.. जैसे परली पार निकल जाएगा।

चाची ने थप्पड़ बरसाने बंद कर दिए और दोनों हाथ जमीन पर टेककर टांगें कुछ और चौड़ी कर लीं। फिर एक हाथ पीछे लाकर चंदर की कमर पकड़कर अपने ऊपर खींची। चंदर ने नीचे झुककर उनकी पीठ कस ली, जैसे कोई कुत्ता कुतिया पर चढ़ा हो।

कुछ ही घस्सों में खेल हो गया.. उम्म्ह… अहह… हय… याह… उसका लावा नसों में से होकर लंड तक पहुँचता लग रहा था। उसने और कसकर दबाया.. तो जरा सी देर में लंड से फव्वारे छूट पड़े।

वह कांपता-कसकता और जोर से लंड गड़ाता गया और दानवों की तरह चिंघाड़ता गया। तब तक लगा रहा.. जब तक कि सारा लहू निचुड़ नहीं गया।

काफी देर बाद उसने निकाला तो ‘फच्च..’ की आवाज के साथ लंड बाहर आया। वह सफेद लेस में लिपटा हुआ था। चूत का मुँह एकदम बंद नहीं हुआ और उसमें से भी लेस निकली।

चाची धीरे से सीधी हुईं और पेटीकोट नीचे किया, वह आंख नहीं मिला पा रही थीं, उनके बालों की लटें अस्त व्यस्त से आंखों पर आ गई थीं, जिसे ठीक करने की उन्होंने कोई कोशिश नहीं की।
चंदर ने देखा कि चाची मुंह नीचे किये मंद मंद मुस्कुरा रही थी।

जल्दी-जल्दी घास पल्ली में भरी, साड़ी लपेटी और गठरी उठाकर घर चल दीं।
जाते हुए चंदर से बोली- बड़ा बदमाश निकला रे चंदर तू! रात को छत पे मिलना!

बारिश और तेज हो गई थी, चंदर मेढ़ पर बैठा रहा.. वो इतना संतुष्ट था कि जैसे जन्नत को आंखों के सामने देख रहा था।

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